'अनुसूचित जाति आयोग का काम आपराधिक अपराध तय करना नहीं', असिस्टेंट प्रोफेसर के खिलाफ दिए आदेश को हाईकोर्ट ने किया रद्द
Updated on
25-09-2026
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति आयोग के इस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक असिस्टेंट प्रोफेसर को एससी-एसटी अधिनियम में दोषी ठहराया गया था। साथ ही एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की गई थी। कोर्ट ने कहा कि कोई वैधानिक आयोग आपराधिक अपराध तय नहीं कर सकता है।अधिकारियों पर फैसला नहीं कर सकते
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने आठ सितंबर को पारित एक आदेश में कहा कि आयोग सबूत इकट्ठा करने और रिकॉर्ड मांगने के लिए सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन वे अधिकारों पर फैसला नहीं कर सकते। किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी नहीं ठहरा सकते। जज ने कहा कि आपराधिक अपराध तय करना एक सक्षम आपराधिक अदालत का काम है, न कि आयोग का।प्रोफेसर पर ब्लैकमेल करने का आरोप
दरअसल, कोरबा जिले के बरपाली सरकारी कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव पर एक छात्रा ने आरोप लगाया था कि उन्होंने 2019 में नकल के मामले को दबाकर उसे ब्लैकमेल किया। साथ ही उसका यौन उत्पीड़न किया। यादव और उनके सहयोगी ने उसे परीक्षा के दौरान नकल करते हुए पकड़ा था।पुलिस की जांच में आरोप बेबुनियाद निकली
वहीं, पुलिस की जांच में आरोप बेबुनियाद निकले थे। इसके बाद छात्रा राज्य अनुसूचित आयोग में गई थी। इसके बाद उन्होंने फरवरी 2020 में अपना जवाब दाखिल किया।आयोग ने एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की
इसके बाद मार्च 2021 में आयोग ने एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1) के तहत यादव के खिलाफ आरोपों को सही ठहराया और एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की।वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन किया
यादव के वकील कबीर कलवानी ने कहा कि आयोग ने उन्हें दोषी ठहराकर अपनी वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन किया है। असल में आयोग ने सिफारिश करने वाली संस्था के बजाए फैसला सुनाने वाली संस्था की तरह काम किया।एससी समुदाय के सदस्यों की रक्षा करना
वहीं, आयोग की वकील पूर्णिमा सिंह ने तर्क दिया कि निर्देश सलाहकारी था और इसका मकसद एससी समुदाय के सदस्यों के अधिकारियों की रक्षा करना था। हाईकोर्ट ने उस तर्क को खारिज कर दिया और वैधानिक आयोगों की सीमाओं को परिभाषित करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए निर्देश को रद्द कर दिया।
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