ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने की क्या जरूरत है? यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता रूपनारायण एक्का की अग्रिम जमानत याचिका से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी है कि फेसबुक पोस्ट में इतिहास से जुड़ी एक बात कही गई थी और यह अपने आप में अपराध नहीं है।
उन्होंने मामले को निराधार बताते हुए कहा कि इस तरह की पोस्ट के लिए FIR दर्ज नहीं होनी चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि, इसी वजह से हमने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है।
फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा था?
दरअसल, यह मामला 13 अप्रैल 2025 को फेसबुक पर की गई एक पोस्ट से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पोस्ट में हिंदू महिलाओं को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी। इसके बाद ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष दीपक मिश्रा की शिकायत पर केस दर्ज किया गया।
एक्का की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि पोस्ट में ‘ब्रेस्ट टैक्स’ का जिक्र किया गया था। इसमें दावा किया गया था कि महिलाओं के स्तन ढकने पर लगाया जाने वाला टैक्स मुगल शासक औरंगजेब ने नहीं, बल्कि एक ब्राह्मण ने लगाया था।
यह इतिहास को लेकर एक राय थी, जो गलत भी हो सकती है, लेकिन केवल ऐसी पोस्ट के आधार पर अपराध नहीं बनता।
पुलिस को बड़े मामलों पर ध्यान देना चाहिए
इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि इसी वजह से कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है। वहीं, जस्टिस आर. महादेवन ने सवाल उठाया कि ऐसी पोस्ट के लिए FIR दर्ज करने की जरूरत क्या थी।
उन्होंने कहा कि पुलिस को बड़े मामलों पर ध्यान देना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने यह भी टिप्पणी की कि लोगों के पास समय बर्बाद करने के लिए बहुत समय है।
पुलिस के सामने पेश नहीं हुए आरोपी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने बताया कि 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी होने के बाद भी एक्का पुलिस थाने में पेश नहीं हुए हैं। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि उन्हें बुलाया जाए, वह पेश होंगे। राज्य सरकार के वकील ने बताया कि उन्हें पेश होने के लिए नोटिस जारी किया जा रहा है।
प्रशांत भूषण ने राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को कम से कम अपना जवाब दाखिल करना चाहिए था।
जशपुर के कुनकुरी थाने में दर्ज है FIR
जशपुर जिले के कुनकुरी पुलिस ने रूपनारायण एक्का के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 और 353(2) के तहत FIR दर्ज की थी। धारा 299 धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से धर्म या धार्मिक मान्यताओं का जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण अपमान करने से संबंधित है।
वहीं, धारा 353(2) विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य या घृणा बढ़ाने के इरादे से झूठी जानकारी या अफवाह फैलाने से संबंधित है।
हाईकोर्ट से नहीं मिली थी अग्रिम जमानत
FIR के बाद रूपनारायण एक्का ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को उनकी पहली याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद दाखिल दूसरी याचिका भी 3 जुलाई 2026 को खारिज कर दी गई। राहत नहीं मिलने पर एक्का ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर को याचिका पर नोटिस जारी करते हुए जांच में सहयोग की शर्त पर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं करने का अंतरिम निर्देश दिया था। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 4 दिसंबर को होगी।