पिता सिविल जज रहे...16.99 लाख सैलरी, OBC सर्टिफिकेट नहीं मिला:MP हाईकोर्ट ने कहा- क्रीमीलेयर के लिए सिर्फ आय नहीं, पद और सेवा-श्रेणी भी देखें

Updated on 02-10-2026

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने OBC क्रीमीलेयर तय करने के मामले में कहा है कि केवल माता-पिता की आय को आधार बनाकर फैसला नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित सरकारी पद की कैटेगरी, सेवा-स्थिति, प्रमोशन की तारीख और आय की प्रकृति समेत लागू सरकारी नियमों को भी देखना होगा।

मामला रागिनी राठौर के OBC जाति प्रमाण-पत्र से जुड़ा है। अधिकारियों ने उनके आवेदन को इस आधार पर खारिज किया था कि उनके पिता की आय 16.99 लाख रुपए थी। हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2020 और 29 नवंबर 2022 के पुराने आदेश रद्द कर दिए और सक्षम अधिकारी को आवेदन पर नए सिरे से फैसला करने के निर्देश दिए हैं।

पिता सिविल ज क्लास-II से क्लास-I बने थे

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके पिता की शुरुआती नियुक्ति सिविल जज क्लास-II के रूप में हुई थी। वे 16 जून 2008 को 40 साल की उम्र के बाद सिविज जल क्लास-I के पद पर प्रमोट हुए। यह भी बताया गया कि पिता की आय का स्रोत सिर्फ वेतन है।

याचिका में कहा गया कि पिता की सकल सैलरी 16.99 लाख रुपए होने को अकेला आधार बनाकर क्रीमीलेयर तय नहीं की जा सकती। सेवा-श्रेणी और पद से जुड़े नियमों को भी देखा जाना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के Rohith Nathan फैसले का हवाला

याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India vs Rohith Nathan फैसले का हवाला दिया। 11 मार्च 2026 के इस फैसले में क्रीमीलेयर तय करने के लिए सिर्फ आय को आधार बनाने के बजाय माता-पिता के पद और सेवा की कैटेगरी को भी महत्वपूर्ण माना गया है। हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, वेतन और कृषि आय को अन्य स्रोतों की आय के साथ यांत्रिक तरीके से जोड़कर क्रीमीलेयर तय नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सुनीता यादव वर्सेस मप्र राज्य मामले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि क्रीमीलेयर की जांच माता-पिता की सेवा-स्थिति और लागू श्रेणियों के संदर्भ में की जानी चाहिए और मौद्रिक सीमा को अलग से देखकर निर्णय नहीं किया जा सकता।

पुराने दोनों आदेश रद्द, 6 हफ्ते में फिर फैसला

हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2020 का SDO का आदेश और 29 नवंबर 2022 का अपीलीय आदेश रद्द कर दिया। मामला सक्षम अधिकारी को वापस भेजते हुए कहा कि रागिनी के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाए।

इसमें पिता की सेवा-स्थिति, प्रमोशन की तारीख, आय की प्रकृति, लागू सरकारी सर्कुलर और संबंधित अदालती फैसलों को ध्यान में रखा जाए। सक्षम अधिकारी को प्रमाणित आदेश की प्रति मिलने के बाद अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करने को कहा गया है।

OBC प्रमाण-पत्र देने का आदेश नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने रागिनी को OBC प्रमाण-पत्र देने की पात्रता पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अब सक्षम अधिकारी लागू नियमों, सरकारी सर्कुलर, अदालती फैसलों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा। यानी कोर्ट का आदेश पुराने फैसलों को निरस्त कर मामले की नियमों के अनुसार नए सिरे से जांच कराने का है।



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