समंदर में संकट, सब्सिडी का दबाव... खाद आयात बिगाड़ सकता है भारत का बजट, क्या किसानों पर पड़ेगा बोझ?

Updated on 28-04-2026
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया संकट का असर भारत में सिर्फ कच्चे तेल या गैस तक सीमित नहीं है। खाड़ी देशों से आने वाली खाद यानी उर्वरक पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। दरअसल, भारत की राजकोषीय रणनीति इस समय एक परफेक्ट स्टॉर्म यानी भीषण संकट का सामना कर रही है।

पश्चिम एशिया संकट ने न केवल आयातित उर्वरकों की लागत बढ़ा दी है, बल्कि घरेलू उत्पादन को भी महंगा कर दिया है। सरकार के सामने अब बड़ी दुविधा है कि या तो वह बढ़ते राजकोषीय घाटे को स्वीकार करे या फिर खाद की कीमतों को बढ़ने दे, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति अनियंत्रित हो सकती है। वहीं इस संकट का असर किसानों पर भी दिखाई दे सकता है। हालांकि सरकार ने इस बारे में काफी बातें पूरी तरह स्पष्ट कर दी हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक अप्रैल में यूरिया आयात कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं।

राजकोषीय घाटे पर दबाव

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026-27 में राजकोषीय घाटा GDP के 4.3% तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा था। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरक, भोजन और पेट्रोलियम सब्सिडी बजट अनुमानों से काफी ज्यादा हो सकती है। बिजनेस टुडे के मुताबिक EY के मुख्य नीति सलाहकार डी. के. श्रीवास्तव बताते हैं कि बजट का अनुमान कच्चे तेल की 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल की कीमत मानकर लगाया गया था। अब सरकार को अतिरिक्त सब्सिडी की गुंजाइश देखनी होगी।

खाद सब्सिडी का बढ़ता बिल

  • क्रिसिल इंटेलिजेंस के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के लिए उर्वरक सब्सिडी बजट से 14% अधिक होकर 1.92 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
  • चालू वित्त वर्ष में भी वास्तविक खर्च 2 लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है, जबकि वित्त वर्ष 2027 के लिए बजट में 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

कितना पड़ा असर?

  • अप्रैल 2026 में यूरिया की आयात कीमतें लगभग दोगुनी होकर 935 से 959 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई हैं।
  • सल्फर की कीमतें 50% बढ़कर 630 डॉलर प्रति मीट्रिक टन हो गई हैं, जिससे जटिल खादों का खर्च बढ़ गया है।
  • प्राकृतिक गैस की कमी और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से मार्च 2026 में घरेलू यूरिया उत्पादन में 25% की गिरावट आई है।

आयात पर भारत की निर्भरता

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उत्पादक और उपभोक्ता है, लेकिन इसकी निर्भरता काफी गहरी है:
  • सीधी निर्भरता: यूरिया (20%) और DAP (50%)
  • प्रभावी निर्भरता: अगर कच्चे माल (LNG और रसायनों) को जोड़ लिया जाए, तो सप्लाई चेन की निर्भरता 68-70% तक पहुंच जाती है।
  • खाड़ी क्षेत्र का महत्व: भारत अपनी जरूरत का 20 से 30% यूरिया, 30% DAP और 50% LNG खाड़ी देशों से आयात करता है।

क्या किसानों पर पड़ेगा बोझ?

बड़ा सवाल है कि इस दबाव के बावजूद क्या सरकार किसानों पर भी इसका बोझ डालेगी? इसे लेकर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि इसका बोझ किसानों पर नहीं डाला जाएगा। सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजना के तहत निर्माताओं को 100% सब्सिडी प्रदान करती है ताकि किसानों के लिए खुदरा कीमतें स्थिर रहें।

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